28 जून 2019 - 13:37
अरब देशों ने पोम्पियो के लिए रेड कारपेट और कुशनर के क़दमों में दौलत बिछाई है, अफ़ग़ानिस्तान में क्यों कामयाब हो रहा है ईरान?

दो राजधानियां ऐसी हैं जहां अमरीकी अधिकारी गुप्त रूप से यात्रा पर जा रहे हैं। एक बग़दाद है और दूसरी राजधानी है काबुल। दोनों में एक समानता यह है कि दोनों पर अमरीका ने हमला और क़ब्ज़ा किया। अमरीका का तो दावा था कि वह आदर्श लोकतंत्र और सुरक्षा के लिए यह हमले कर रहा है।

नैटो ने तालेबान की उस घोषणा की पुष्टि की है जिसमें उन्होंने वारदक प्रांत में दो अमरीकी सैनिकों को ढेर कर देने का दावा किया था। इस तरह जारी वर्ष में अफ़ग़ानिस्तान में मरने वाले अमरीकी सैनिकों की संख्या 9 हो गई है और ईरान तथा अमरीका के बीच हालिया समय में बढ़ते हुए तनाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि अमरीका को होने वाले जानी नुक़सान में वृद्धि हो सकती है इसलिए कि अफ़ग़ानिस्तान में भी ईरान का काफ़ी प्रभाव है।

अमरीका वास्तव में अफ़ग़ानिस्तान का युद्ध उसी तरह हार चुका है जिस तरह इराक़ युद्ध में उसे पराजय हुई मगर अमरीका की समझ में यह बात नहीं आ रही है कि किस तरह अपनी इज़्ज़त संभाल कर वहां से बाहर निकल जाए। अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीका के क़ब्ज़े के बाद जो सरकार बनी उसके नियंत्रण में पूरा देश नहीं है केवल एक चौथाई भाग पर भी इस सरकार का राज चल रहा है।

अफ़ग़ानिस्तान युद्ध में मरने वाले अमरीकी सैनिकों की संख्या 2300 तक पहुंच चुकी है। वर्ष 2014 में अमरीकी सैनिकों के आप्रेशन के स्वभाव को बदल दिया गया जिसके बाद अमरीकी को होने वाला जानी नुक़सान बहुत कम हो गया।

अमरीका तथा उसके घटकों ने अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध में 1 ट्रिलियन 70 अरब डालर की रक़म ख़र्च कर दी। 60 अरब डालर तो अफ़ग़ान सैनिकों को प्रशिक्षण देने पर ख़र्च हुए। लेकिन इसका कोई ठोस नतीजा नहीं मिल सका है। क्योंकि प्रशिक्षण लेने वाले बहुत से सैनिक मारे गए। अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने एक इंटरव्यू में बताया कि जबसे उन्होंने सत्ता संभाली है उस समय से अब तक 45 हज़ार अफ़ग़ान सैनिक मारे जा चुके हैं।

इस बीच दो अमरीकी सैनिकों के मारे जाने की ख़बर भी। यह सैनिक ऐसे समय मारे गए हैं जब अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने अफ़ग़ानिस्तान का ख़ुफिया दौरा किया। शायद तालेबान ने यह उपहार देकर अमरीका को चेतावनी दी है कि आने वाले दिन अमरीका के लिए और भी कठिन हो जाएंगे अतः अमरीका तालेबान से कोई मांग मनवाने की कोशिश न करे।

तालेबान ने एक तो वार्ता के समय भी अपनी लड़ाई बंद नहीं की, वार्ता की तो अफ़ग़ान सरकार को अपना पक्ष नहीं बनाया बल्कि ख़ुद अमरीका से बात की और अपनी उन तमाम शर्तों को दोहराया जो वह पहले दिन से उठाते आए हैं।

यह लगता है कि आने वाले दिनों और हफ़्तों में तालेबान की हिंसा और बढ़ेगी। अगर ईरान से अमरीका का तनाव बढ़ता है तो अमरीका पर हमले भी तेज़ होंगे।

यहां यह कहना भी ज़रूरी है कि अरब देशों को ईरान से सीखना चाहिए। ईरान ने तालेबान से भी वार्ता की और तालेबान के साथ ईरान का एक समन्वय भी बना। ईरान ने इस मामले में सांप्रदायिक आयामों पर कभी भी ध्यान नहीं दिया। यही काम रूस ने भी किया जिसने मास्को में तालेबान का प्रतिनिधिमंडल बुलाकर उनसे बात की।

यह भी सोचने की बात है कि किसी ज़माने में तालेबान ईरान को अपना सबसे बड़ा दुशमन समझते थे वहीं तालेबान से रूस का तो युद्ध हो चुका था। सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान से बाहर करने में तालेबान की भूमिका थी मगर रूस ने भी तालेबान से बात की। इस तरह देखा जाए तो रूस और ईरान के साथ तालेबान के संबंध बन गए हैं जबकि अरब दुनिया अमरीका के साथ खड़ी है जिन्हें तालेबान अपना सबसे बड़ा दुशमन मानते है। जबकि सोवियत संघ के विरुद्ध अफ़ग़ानिस्तान में होने वाली लड़ाई में अरब देशों ने तालेबान का ख़ूब साथ दिया था। यह अरब जगत की कूटनैतिक और रणनैतिक मूर्खता है। वह एक एक करके सब कुछ गंवाते जा रहे हैं।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार